खेल खिलाड़ी | 14.11.2009
एक महान बल्लेबाज़ और औसत कप्तान!
15 नवम्बर 1989 को सचिन तेंदुलकर ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पहला कदम रखा था. जिन्होंने 16 साल के तेंदुलकर को पाकिस्तान के खिलाफ कराची में खेलते देखा था वो उस बच्चे के कायल हो गए थे.
उस समय कप्तान श्रीकांत कृष्णामचारी ने नन्हे सचिन को सिर्फ एक ही बात कही थी. " तुम चार टेस्ट की सीरीज़ में ड्रॉप नहीं होगे बस खुल कर खेलो. आज दो दशक बाद, न सिर्फ श्रीकांत बल्कि सारी दुनिया तेंदुलकर को खुलकर खेलते देखती आई है. श्रीलंका के सफल स्पिनर मुथैया मुरलीथरन कहते हैं कि शायद अगले 100 साल में भी तेंदुलकर जैसा बल्लेबाज़ नहीं पैदा होगा.
लेकिन सवाल यह है कि जब तेंदुलकर इतने प्रतिभाशाली हैं और विश्व के सफलतम गेंदबाज़ उनके नाम से घबराते हैं तो तेंदुलकर एक सफल कप्तान क्यों नहीं बन सके? तेंदुलकर दो बार टीम इंडिया के कप्तान बने ज़रूर लेकिन ऐसा कमाल नहीं दिखा सके जिसकी उनसे अपेक्षा की जाती थी.
1996 में तेंदुलकर ने जब पहली बार कप्तानी संभाली तो उनसे बहुत उमीदें थी लेकिन टीम इंडिया कुछ ख़ास न कर सकी और मोहम्मद अज़हरुद्दीन ने तो यहां तक कह दिया कि "नहीं जीतेगा. छोटे के नसीब में जीत नहीं है''. यह ठीक है कि किसी भी कप्तान के लिए नसीब उतना ही ज़रूरी होता है जितना कौशल और प्रतिभा.
लेकिन यह बात भी नहीं भूलनी चाहिए कि तेंदुलकर ने उस दौर में कप्तानी की कमान संभाली जब मैच-फिक्सिंग ज़ोरों पर थी. कप्तान तेंदुलकर क्या करता जब खिलाडी कुछ पैसों के बदले हारने के लिए ही मैदान में उतरा हो. तेंदुलकर को इसका मलाल तो है लेकिन 20 साल बाद भी वो इस पर ज़्यादा बोलने के लिए तैयार नहीं.
हाल ही में मुंबई में एक प्रेस कांफ्रेंस में तेंदुलकर ने यह कह कर बात टाल दी थी कि वो एक काला अध्याय है और इस पर न ही बोलें तो अच्छा है. यह कहना तो ग़लत ही होगा कि तेंदुलकर के पास एक सफल क्रिकेटर का दिमाग़ नहीं है. जो बल्लेबाज़ 20 साल से दुनिया के बेहतरीन गेंदबाजों के छक्के छुडा रहा हो उसके पास क्रिकेट का दिमाग तो निश्चय ही है.
लेकिन जब बाकी 10 खिलाडी साथ न दें तो कप्तान क्या करे? अगर आंकडो को देखें तो तेंदुलकर निश्चय ही महान कप्तान नहीं कहे जा सकते लेकिन उनकी क्षमता पर शक़ नहीं किया जा सकता.
यह ठीक है कि हर इंसान की तरह तेंदुलकर में भी कुछ कमियां हैं. तेंदुलकर को वर्षों से करीब से जानने वाले खेल पत्रकार विजय लोकपल्ली कहते हैं की "तेंदुलकर आदमी को परखने में अक्सर ग़लती करते हैं और क्रिकेट के लिए उनमें इतना जुनून है कि वो खेल के लिए आंख बंद करके फ़ैसला कर लेते हैं."
लोकपल्ली के अनुसार एक कप्तान के नाते तेंदुलकर अपने बाक़ी खिलाडियों के लिए बोर्ड या चयनकर्ताओं से अक्सर लड़ जाते थे लेकिन उनका साथ सिर्फ अनिल कुंबले ने ही दिया. "अगर बाक़ी 10 खिलाडी भी मैदान पर पूरी जान लगा देते तो शायद तेंदुलकर एक महान बल्लेबाज़ के साथ साथ एक महान कप्तान भी बन जाते.''
जहां तक नसीब का सवाल है तो तेंदुलकर ने सुजीत सोमसुंदर और विक्रम राठौर जैसे युवा खिलाडियों को टीम में जगह दी. लेकिन बस नसीब कहिए या जुनून और जज़्बात, तेंदुलकर का फ़ैसला ग़लत साबित हुआ दोनों ही कुछ न कर सके.
तो क्या सिर्फ इस बिना पर तेंदुलकर को असफल कप्तान कहा जाना चाहिए? तेंदुलकर को कप्तानी की कसौटी पर परखने वाले उनसे वैसे ही कप्तानी चाहते हैं जैसे उनकी बल्लेबाज़ी. इसलिए भी उनकी कप्तानी को कम ही आंका जाता है. भले ही तेंदुलकर महान कप्तान न हों, कम से कम असफल कप्तान तो नहीं थे.











