खोज | 12.03.2010
क्या आपस में जुड़े होते हैं भूकंप
तुर्की के भूकंप की तीव्रता रिक्टर पैमाने पर भले ही छह हो लेकिन इसने भी 57 लोगों की जान ले ली. दूसरी ओर ताइवान, चिली और हैती में आए भूकंप की ख़बरें अब तक ताज़ा हैं. लगातार भूकंप के झटकों ने भले ही आम लोगों को परेशान कर दिया हो लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि भूकंप की संख्या बढ़ी नहीं है. जर्मनी में बोख़ुम में रुअर यूनिवर्सिटी के जिओसाइंस प्रोफ़ेसर वोल्फगांग फ्रीदरिश बताते हैं यह बात भी साबित नहीं हुई है कि इनका आपस में संबंध है.
अमेरिकी भूगर्भीय सर्वे का कहना है कि पिछले साल सिर्फ़ 13 भूकंप ऐसे थे, जिनकी तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 7.0 और सात 7.9 के बीच थी. 8.0 और 9.9 की तीव्रता वाले झटके सिर्फ़ चार बार आए लेकिन भूकंप के हल्के झटके तो साल भर आते रहे.
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हमारी धरती मुख्य तौर पर चार परतों से बनी हुई है, इनर कोर, आउटर कोर, मैनटल और क्रस्ट. क्रस्ट और ऊपरी मैन्टल को हम लिथोस्फ़ेयर कहते हैं. ये 50 किलोमीटर की मोटी परत, वर्गों में बंटी हुई है जिन्हें टैकटोनिक प्लेट्स कहा जाता है. ये टैकटोनिक प्लेट्स अपनी जगह से हिलती रहती हैं लेकिन जब ये बहुत ज़्यादा हिल जाती हैं, तो भूकंप आ जाता है.
"ये प्लेट्स क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर, दोनों ही तरह से अपनी जगह से हिल सकती हैं. इसके बाद वे अपनी जगह तलाशती हैं और ऐसे में एक प्लेट दूसरी के नीचे आ जाती है." -प्रोफ़ेसर वोल्फगांग फ्रीदरिश
दुनिया का सबसे ज़्यादा भूकंप प्रभावित इलाक़ा प्रशांत महासागर के आस पास है, जो घोड़े की नाल की तरह दिखता है और जिसे रिंग ऑफ़ फ़ायर कहते हैं. इसके आस पास के देशों, न्यूज़ीलैंड, जापान, चिली और अमेरिकी प्रांत अलास्का में आए दिन भूकंप आते रहते हैं. फ्रीदरिश कहते हैं कि भूविज्ञान की जानकारी और आंकड़ों की गणना से पता चलता है कि किसी एक हिस्से में भूकंप आने से विश्व के दूसरे क्षेत्रों पर दबाव बढ़ जाता है. और आंकड़ों को जोड़ें तो ये बात सामने आई है कि हाल ही में हैती और चिली में आए भूकंप से धरती पर तनाव एक क्षेत्र से तो कम हुआ लेकिन दूसरे क्षेत्रों में बढ़ गया.
कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि एक क्षेत्र में भूकंप के बाद भूमि तनाव दूसरे क्षेत्रों की टैक्टोनिक प्लेट्स पर असर डालती हैं. ये बात निश्चित है. लेकिन एक भूकंप से दूसरे भूकंप के बीच संबंध निकालना मुश्किल है. हैती में भूकंप आने के थोड़े ही दिन बाद चिली में भूकंप आना एक इत्तफ़ाक़ की बात भी हो सकती है.
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दरअसल विज्ञान की तरक्की के साथ भी ऐसा लगने लगा है कि भूकंप की संख्या बढ़ रही है. भूकंप पर रिसर्च कर रहे रीनर किंड का कहना है कि पिछले कुछ दशकों में भूविज्ञान ने काफ़ी तरक्की की है. तीस साल पहले भूकंप की रिकॉर्डिंग कागज पर होती थी और पूरे विश्व में इसे मापने के स्टेशन भी गिने चुने थे. लेकिन अब स्टेशन तो बढ़ ही गए हैं, साथ ही साथ डिजिटल उपकरण भी इस्तेमाल किए जाने लगे हैं. जिससे भूकंप के फ़ौरन बाद इसकी तीव्रता मापी जा सकती है.
किंड का कहना है कि मीडिया पर अब भूकंप पर ज़्यादा ध्यान देने लगा है और इस वजह से भी इसकी गंभीरता सामने आई है. जब हैती और चिली में भूकंप आए तो मिनटों में दुनिया भर की मीडिया में हलचल मच गई थी. वैज्ञानिकों का कहना है कि हर साल लगभग 100 भूकंपों का सामना करते हैं लेकिन हमें सिर्फ़ बड़े झटकों की ही जानकारी मिलती है और ऐसे में डर थोड़ा कम हो जाता है.
रिपोर्टः श्रेया कथूरिया
संपादनः ए जमाल
















